पड़ाव (Padaav)

अप्रैल 20, 2010 at 11:59 अपराह्न (Poetry) (, , , , , )

— Ghanshyam

कल वाले सांचे में ढला
प्रतीत होता नहीं
आज का भोर;
सूरत और सीरत – कोई भी
लगती नहीं बासी |
तब भी,
कल वाला भोर नया था,
आज वाला भी नया है |
कल के भोर
उपजा था नया रंग,
नया संगीत;
कल भी भोर
महका था नया-नया |
आजसे कम उल्लासित नहीं था
कल का भोर,
होने को जैसे कम उल्लासित नहीं
शायद आज के बाद भोर |
कल वाले भोर ने
जैसे शुरू की यात्रा
नए पड़ाव से,
आज का भी भोर
चलने को उद्दत है
एक नए पड़ाव से |

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कला जीने की (Kala Jeene Ki)

मार्च 26, 2010 at 12:02 पूर्वाह्न (Poetry) (, , , , , )

– Ghanshyam

जीना रहता यदि
हवा और पानी को,
सूरज की किरणों को अथवा
चन्द्रमा की ज्योत्सना को —
सरपट दौड़ता मैं
बेलगाम रह पर |
किन्तु,
मुझे जीना है तुम्हे,
तुम्हारी अपेक्षाओं को, तुम्हारी शिकायतों को
लेने नहीं देती जो कभी दम मुझे |
जीने की कला में इसी कारण
निष्पात होने को,
चाबुक पर चाबुक
दिए जाता हूँ मैं
अपनी पीठ पर |

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डरा हुआ आदमी (Dara Hua Aadmi)

मार्च 24, 2010 at 11:47 अपराह्न (Poetry) (, , , , , )

– Ghanshyam

तुम चलते-चलते भी नहीं थकते,
मैं लेटे-लेटे ही थक जाता हूँ |
पुरानी सुखद स्मृतियों के पन्ने
आखिर सीमित हैं
जिनकी आवृत्ति मैं
लेटे-लेटे किया करता हूँ |
अंधकार में पड़ी-पड़ी
यह स्मृतियाँ
जिनसे मैं ज़िन्दगी की अपेक्षा रखता हूँ
अब सीलन से भर गयी हैं |
तुम्हारे स्वस्थ, अवदात मुखारविंद से
जो ज्योति झरती है
वह रोज़ नई हवा, नई रौशनी से
झूमने का परिणाम है |
पर मैं डरा हुआ आदमी हूँ |
सुखद स्मृतियों की अपनी छोटी जीर्ण शीर्ण पुस्तक
नये दिन, नये सूरज और नई संझा को
भेंट नहीं कर सकता |

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शुचिता

जुलाई 24, 2009 at 11:41 अपराह्न (Poetry) ()

— Ghanshyam

सांसों की परिधि के बहार,

लय के नि:शेष होने पर,

मौन धड़कन भी अदृश्यरेफ है जहां,

चित्र-शुचिता जिससे भंग होती है,

उस अतल में ले चलो मां मुझे,

जननी गंगा के उदगम बिंदु में, सिन्धु में

                                              डुबो दो मुझे!

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अग्नि-अभिसार

दिसम्बर 7, 2008 at 8:39 अपराह्न (Poetry) ()

– Ghanshyam

रोष, क्रोध दो, इर्ष्या दो, अग्नि-अभिसार |
बधिर कर दो, संज्ञाशून्य;
चूर्ण-विचूर्ण भस्मित हो जाऊं मैं |

आशीष अभिषिक्त तब, बरसे लोचन,
सुरभि, संगीत, रसलिंगन,
जीवन हो आलोकित, सक्षम |

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बीता नहीं हूँ मैं

अक्टूबर 6, 2008 at 6:22 अपराह्न (Poetry) ()

— Ghanshyam *

कम क्या गुनाह से
        बाँध टकटकी देखना
सफ़ेद पड़ते बालों को मेरे,
        और कहना मुझसे किस्से
सिर्फ़ बुढापे के,
        उतर नहीं पाती जो उस सीने तले
संजोयी हैं जहाँ किस्से अनमोल
        बासंती दिवसों और महकती रातों के?
काश, मैं तुम्हे बता सकता. —
        बीता नहीं हूँ मैं,
बीती है वह
        लोग देते हैं संज्ञा जिसे
उम्र की.

* The poet’s full name is Ghanshyam Chandra Prasad Sinha. He was also known as Shri G C P Sinha.

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