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जुलाई 22, 2009 at 4:51 अपराह्न (Poetry)

— Ghanshyam

पागल होना एनायत नहीं तो क्या,
कई बार टकराया हूँ मैं तुमसे;
कई बार ग़ालिब जुबां पे उतरे हैं,
कई बार मैं औलिया कहलाया हूँ|

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अपने से हट के

जनवरी 30, 2009 at 12:03 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

एक सांचे में ढले क्षण
कुछ हास के हो गए,
कुछ रुदन के,
अपने से हट यदि हम देख पाते दृश्यों को,
जिंदगी इतनी परेशान न होती|

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आँखों की चमक

जनवरी 29, 2009 at 12:02 पूर्वाह्न (Poetry)

— Ghamshyam

मैंने आंखों की चमक देखी है;
मैंने उनसे झड़ती चिनगारियां भी देखी हैं;
पर तुम्हारी आंखों में तो मुझे प्रकाश दिखाई देता है,
शायद तुमने अपना घर जला दिया है|

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तुम्हारी बात अलग है

जनवरी 28, 2009 at 12:08 अपराह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

जैसे ही मेरी लेखनी
उमड़ते तूफानों के,
दहकते शोलों के,
रेंगते कीडों के,
अकुलाते वाष्प के
कुछ अंग
पकड़ने में सक्षम होती है,
मैं हल्का हो उठता हूँ|
            मेरी लेखनी असल में
            मात्र इसी प्रयोजन से,
            मात्र मुझे हल्का करने को
            कार्यरत होती है
महात्मा के सदृश्य
यदि मैं हार्दिक आवेग-उद्वेगों को
पचा पाता,
या फिर इन्द्रियों के मध्यम से
उन्हें बाहर निकाल पाता,
तो मेरे लिए लिखने की
आवश्यकता ही न होती|
पर मेरे इर्द-गिर्द लोगों का वास्ता
मेरी दुखानुभूतियों से नहीं,
मेरी सुखानुभूतियों से हैं;
और इन्द्रियों के मध्यम से
अपनी दुखानुभूतियों को बाहर निकालने की
बी मुझमे क्षमता नहीं —-
मैं काफ़ी सयाना हो गया हूँ|
            मेरी लेखनी द्वारा
            पीड़ा और कचोट के,
            ईर्ष्या और क्रोध के,
            क्षोभ और स्पर्धा के
            अनायास जो भावचित्र खिंच गए हैं,
            उन्हें तुम कविता की संज्ञा देते हो;
            और तुम्हारा आग्रह है कि मैं भी
            कवि सम्मेलनों में भाग लूँ|
तुम भूलते हो —-
कवि सम्मलेन कवियों के लिए
आयोजित नहीं होता|
उसका आयोजन विशेष अवसर पर
किया जाता है;
और उसमें श्रोता के रूप में
गिने-चुने कवियों के अलावा
अन्य लोग ही अधिक होते हैं|
            तुम्हारी बात अलग है|
            तुम सपरिश्रम कविता लिखते हो,
            तुम्हारा यही व्यवसाय है|
            अनुभूति और चिंतन के पचड़े में न पड़
            इसी कारण अपने उक्ति-वैचित्र्य से,
            तुम लोगों का मनोरंजन करना जानते हो;
            और लोग तुम्हें महाकवि कि उपाधि से भी
            विभूषित कर चुके हैं|

It is the poet’s birthday today.

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अग्नि-अभिसार

दिसम्बर 7, 2008 at 8:39 अपराह्न (Poetry) ()

– Ghanshyam

रोष, क्रोध दो, इर्ष्या दो, अग्नि-अभिसार |
बधिर कर दो, संज्ञाशून्य;
चूर्ण-विचूर्ण भस्मित हो जाऊं मैं |

आशीष अभिषिक्त तब, बरसे लोचन,
सुरभि, संगीत, रसलिंगन,
जीवन हो आलोकित, सक्षम |

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दो पंक्तियाँ

दिसम्बर 7, 2008 at 8:31 अपराह्न (Couplet)

– Ghanshyam

पढने को पढ़ा है सबक सादगी का
जीने को कुछ और ही सीखा है |

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Untitled 1

नवम्बर 30, 2008 at 12:32 पूर्वाह्न (Poetry)

– Ghanshyam

तुम्हें यदि घाव देखने हो मेरे,
बढ़ा दो शून्य में तुम हाथ अपना;
जलन का दाग मूर्च्छित हैं वहीँ पर,
दहकता है वहीँ निभृत निर्धूम सपना.

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दो पंक्तियाँ

नवम्बर 30, 2008 at 12:18 पूर्वाह्न (Couplet, Uncategorized)

– Ghanshyam

इतने सपने संजो के रखें हैं दिल ने मेरे,
डूबी रहती हैं नींद में सदा आँखें मेरी.

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बीता नहीं हूँ मैं

अक्टूबर 6, 2008 at 6:22 अपराह्न (Poetry) ()

— Ghanshyam *

कम क्या गुनाह से
        बाँध टकटकी देखना
सफ़ेद पड़ते बालों को मेरे,
        और कहना मुझसे किस्से
सिर्फ़ बुढापे के,
        उतर नहीं पाती जो उस सीने तले
संजोयी हैं जहाँ किस्से अनमोल
        बासंती दिवसों और महकती रातों के?
काश, मैं तुम्हे बता सकता. —
        बीता नहीं हूँ मैं,
बीती है वह
        लोग देते हैं संज्ञा जिसे
उम्र की.

* The poet’s full name is Ghanshyam Chandra Prasad Sinha. He was also known as Shri G C P Sinha.

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A journey begins

अक्टूबर 6, 2008 at 4:33 पूर्वाह्न (Biography) ()

This blog is dedicated to the poet, Ghanshyam (1925-2004). Though a busy civil servant, he found time for beautiful poetry. A master at playing with words, both in Hindi and English with equal elan, Ghanshyam was a well-appreciated poet in his circles. (He would cringe at my handling of words.) He never ran after fame, instead kept away from it, but one of his numerous poems in national Hindi journals made Dr Rajendra Prasad, our first president, write a personal letter to Ghanshyam.

Several of Ghanshyam’s poems were published in Hindi journals like Aajkal and leading Hindi newspapers. In his early life, Ghanshyam dabbled with journalism; he would have made a big name for himself had his family not thought of the civil services as the better profession.

People who knew him as a civil servant still vouch for his values and honesty, and those who knew him as a poet cannot but admire the way he strung words together to express deep emotions and observations. Ghanshyam and Ramgopal Sharma ‘Rudra’, a known Hindi poet from Patna used to play chess together on a daily basis and discuss literature. Rudraji, as people fondly called him, loved Ghanshyam’s poetry and was a constant source of encouragement.

Ghanshyam led a tough but fulfilling life in his last years, raising his youngest children.

This blog is dedicated to the poet in him.

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