दो पंक्तियाँ (A couplet)

मई 7, 2014 at 11:08 अपराह्न (Uncategorized)

—– Ghanshyam

Ghanshyamअपनी शख़्सियत का उन्हें होश नहीं
ग़ैर की वाह-वाही किये जाते हैं ।

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दो पंक्तियाँ

जनवरी 30, 2011 at 12:39 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

अब न फिसलने का डर है, न चकाचौंध होने का,
मैंने सीख लिया है सबक, नीची नज़र रखने का |

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सांत्वना मरियल सी

जनवरी 29, 2011 at 12:01 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

क्यों बार-बार आती है मेरी आँखों के सामने
पोर-पोर सूखी और बदरंगी पेड़ों की गलियाँ?
क्या हुआ है मेरी याददाश्त को की मैं भूल गया हूँ
हरियालियों के सारे खूबसूरत नज़ारे?
क्यों बुझा-बुझा सा मैं दीखता हूँ दोस्तों के बीच,
क्यों अचानक लंगड़ा गया मेरा सबल व्यक्तित्व?
क्यों कोई धकेलता है मुझे पीछे से रास्ते पर,
इस तरह रास्ते क्यों लम्बे होते जाते हैं?
एक मरियल सी सांत्वना शेष है — भीड़ में मैं अकेला नहीं हूँ |

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दो पंक्तियाँ

जुलाई 22, 2009 at 5:12 अपराह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

अदावत को अब भी तो अलविदा दो दोस्त
रस्म-अदायगी के आंसुओं से क्यों भिगोते हो कफ़न मेरा?

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अपने से हट के

जनवरी 30, 2009 at 12:03 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

एक सांचे में ढले क्षण
कुछ हास के हो गए,
कुछ रुदन के,
अपने से हट यदि हम देख पाते दृश्यों को,
जिंदगी इतनी परेशान न होती|

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तुम्हारी बात अलग है

जनवरी 28, 2009 at 12:08 अपराह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

जैसे ही मेरी लेखनी
उमड़ते तूफानों के,
दहकते शोलों के,
रेंगते कीडों के,
अकुलाते वाष्प के
कुछ अंग
पकड़ने में सक्षम होती है,
मैं हल्का हो उठता हूँ|
            मेरी लेखनी असल में
            मात्र इसी प्रयोजन से,
            मात्र मुझे हल्का करने को
            कार्यरत होती है
महात्मा के सदृश्य
यदि मैं हार्दिक आवेग-उद्वेगों को
पचा पाता,
या फिर इन्द्रियों के मध्यम से
उन्हें बाहर निकाल पाता,
तो मेरे लिए लिखने की
आवश्यकता ही न होती|
पर मेरे इर्द-गिर्द लोगों का वास्ता
मेरी दुखानुभूतियों से नहीं,
मेरी सुखानुभूतियों से हैं;
और इन्द्रियों के मध्यम से
अपनी दुखानुभूतियों को बाहर निकालने की
बी मुझमे क्षमता नहीं —-
मैं काफ़ी सयाना हो गया हूँ|
            मेरी लेखनी द्वारा
            पीड़ा और कचोट के,
            ईर्ष्या और क्रोध के,
            क्षोभ और स्पर्धा के
            अनायास जो भावचित्र खिंच गए हैं,
            उन्हें तुम कविता की संज्ञा देते हो;
            और तुम्हारा आग्रह है कि मैं भी
            कवि सम्मेलनों में भाग लूँ|
तुम भूलते हो —-
कवि सम्मलेन कवियों के लिए
आयोजित नहीं होता|
उसका आयोजन विशेष अवसर पर
किया जाता है;
और उसमें श्रोता के रूप में
गिने-चुने कवियों के अलावा
अन्य लोग ही अधिक होते हैं|
            तुम्हारी बात अलग है|
            तुम सपरिश्रम कविता लिखते हो,
            तुम्हारा यही व्यवसाय है|
            अनुभूति और चिंतन के पचड़े में न पड़
            इसी कारण अपने उक्ति-वैचित्र्य से,
            तुम लोगों का मनोरंजन करना जानते हो;
            और लोग तुम्हें महाकवि कि उपाधि से भी
            विभूषित कर चुके हैं|

It is the poet’s birthday today.

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दो पंक्तियाँ

नवम्बर 30, 2008 at 12:18 पूर्वाह्न (Couplet, Uncategorized)

– Ghanshyam

इतने सपने संजो के रखें हैं दिल ने मेरे,
डूबी रहती हैं नींद में सदा आँखें मेरी.

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