क्षमा-याचना

जनवरी 28, 2012 at 11:37 अपराह्न (Poetry)

— Ghanshyam

(Written for his year old daughter in 1981)

अल्पकालीन प्रवास में भी
तुम्हारा ध्यान
मुझे कातर करता रहा,
और लौटती बार लम्बे सफ़र में
नींद की जगह
तुम ही झूलती रही
मेरी आँखों में रात भर |
अभी जब मैं अहले सुबह
प्रवास से लौटा हूँ,
और अहाते का फाटक खोल
दरवाज़े पर पहुँच
तुम्हे पुकारने वाला ही हूँ
कि ठीक प्रवेशद्वार पर ही
अहाते के भीतर खड़े
अरहर के पौधे की डालियाँ
एक बार हवा में लहरा
मेरे माथे पर झुक पड़ी हैं,
और एक मसृण गुदगुदाहट ने
मुझे वात्सल्य-विभोर कर दिया है,
अकथ – अनाम निस्पृहता की एक बयार से
मेरी आँखें नाम हो उठी हैं ;
अपनी प्राणप्रिया नन्ही बिटिया को भूल
मैं डालियों को गले लगा
क्षमा-याचना के भाव से
भर उठा हूँ |

(It is the poet’s birthday today.)

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