दो पंक्तियाँ

जनवरी 30, 2011 at 12:39 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

अब न फिसलने का डर है, न चकाचौंध होने का,
मैंने सीख लिया है सबक, नीची नज़र रखने का |

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सांत्वना मरियल सी

जनवरी 29, 2011 at 12:01 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

क्यों बार-बार आती है मेरी आँखों के सामने
पोर-पोर सूखी और बदरंगी पेड़ों की गलियाँ?
क्या हुआ है मेरी याददाश्त को की मैं भूल गया हूँ
हरियालियों के सारे खूबसूरत नज़ारे?
क्यों बुझा-बुझा सा मैं दीखता हूँ दोस्तों के बीच,
क्यों अचानक लंगड़ा गया मेरा सबल व्यक्तित्व?
क्यों कोई धकेलता है मुझे पीछे से रास्ते पर,
इस तरह रास्ते क्यों लम्बे होते जाते हैं?
एक मरियल सी सांत्वना शेष है — भीड़ में मैं अकेला नहीं हूँ |

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दो पंक्तियाँ

जनवरी 28, 2011 at 10:38 अपराह्न (Couplet)

— Ghanshyam

चाँद छूने के बाद तुम्हें छूना है सूरज भी,
मेरे ख़्वाबों का मीनार मगर आसमां से भी ऊंचा है |

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