कला जीने की (Kala Jeene Ki)

मार्च 26, 2010 at 12:02 पूर्वाह्न (Poetry) (, , , , , )

– Ghanshyam

जीना रहता यदि
हवा और पानी को,
सूरज की किरणों को अथवा
चन्द्रमा की ज्योत्सना को —
सरपट दौड़ता मैं
बेलगाम रह पर |
किन्तु,
मुझे जीना है तुम्हे,
तुम्हारी अपेक्षाओं को, तुम्हारी शिकायतों को
लेने नहीं देती जो कभी दम मुझे |
जीने की कला में इसी कारण
निष्पात होने को,
चाबुक पर चाबुक
दिए जाता हूँ मैं
अपनी पीठ पर |

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