कला जीने की (Kala Jeene Ki)

मार्च 26, 2010 at 12:02 पूर्वाह्न (Poetry) (, , , , , )

– Ghanshyam

जीना रहता यदि
हवा और पानी को,
सूरज की किरणों को अथवा
चन्द्रमा की ज्योत्सना को —
सरपट दौड़ता मैं
बेलगाम रह पर |
किन्तु,
मुझे जीना है तुम्हे,
तुम्हारी अपेक्षाओं को, तुम्हारी शिकायतों को
लेने नहीं देती जो कभी दम मुझे |
जीने की कला में इसी कारण
निष्पात होने को,
चाबुक पर चाबुक
दिए जाता हूँ मैं
अपनी पीठ पर |

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डरा हुआ आदमी (Dara Hua Aadmi)

मार्च 24, 2010 at 11:47 अपराह्न (Poetry) (, , , , , )

– Ghanshyam

तुम चलते-चलते भी नहीं थकते,
मैं लेटे-लेटे ही थक जाता हूँ |
पुरानी सुखद स्मृतियों के पन्ने
आखिर सीमित हैं
जिनकी आवृत्ति मैं
लेटे-लेटे किया करता हूँ |
अंधकार में पड़ी-पड़ी
यह स्मृतियाँ
जिनसे मैं ज़िन्दगी की अपेक्षा रखता हूँ
अब सीलन से भर गयी हैं |
तुम्हारे स्वस्थ, अवदात मुखारविंद से
जो ज्योति झरती है
वह रोज़ नई हवा, नई रौशनी से
झूमने का परिणाम है |
पर मैं डरा हुआ आदमी हूँ |
सुखद स्मृतियों की अपनी छोटी जीर्ण शीर्ण पुस्तक
नये दिन, नये सूरज और नई संझा को
भेंट नहीं कर सकता |

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