शुचिता

जुलाई 24, 2009 at 11:41 अपराह्न (Poetry) ()

— Ghanshyam

सांसों की परिधि के बहार,

लय के नि:शेष होने पर,

मौन धड़कन भी अदृश्यरेफ है जहां,

चित्र-शुचिता जिससे भंग होती है,

उस अतल में ले चलो मां मुझे,

जननी गंगा के उदगम बिंदु में, सिन्धु में

                                              डुबो दो मुझे!

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दो पंक्तियाँ

जुलाई 22, 2009 at 5:12 अपराह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

अदावत को अब भी तो अलविदा दो दोस्त
रस्म-अदायगी के आंसुओं से क्यों भिगोते हो कफ़न मेरा?

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Untitled 3

जुलाई 22, 2009 at 4:51 अपराह्न (Poetry)

— Ghanshyam

पागल होना एनायत नहीं तो क्या,
कई बार टकराया हूँ मैं तुमसे;
कई बार ग़ालिब जुबां पे उतरे हैं,
कई बार मैं औलिया कहलाया हूँ|

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