अपने से हट के

जनवरी 30, 2009 at 12:03 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

एक सांचे में ढले क्षण
कुछ हास के हो गए,
कुछ रुदन के,
अपने से हट यदि हम देख पाते दृश्यों को,
जिंदगी इतनी परेशान न होती|

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आँखों की चमक

जनवरी 29, 2009 at 12:02 पूर्वाह्न (Poetry)

— Ghamshyam

मैंने आंखों की चमक देखी है;
मैंने उनसे झड़ती चिनगारियां भी देखी हैं;
पर तुम्हारी आंखों में तो मुझे प्रकाश दिखाई देता है,
शायद तुमने अपना घर जला दिया है|

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तुम्हारी बात अलग है

जनवरी 28, 2009 at 12:08 अपराह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

जैसे ही मेरी लेखनी
उमड़ते तूफानों के,
दहकते शोलों के,
रेंगते कीडों के,
अकुलाते वाष्प के
कुछ अंग
पकड़ने में सक्षम होती है,
मैं हल्का हो उठता हूँ|
            मेरी लेखनी असल में
            मात्र इसी प्रयोजन से,
            मात्र मुझे हल्का करने को
            कार्यरत होती है
महात्मा के सदृश्य
यदि मैं हार्दिक आवेग-उद्वेगों को
पचा पाता,
या फिर इन्द्रियों के मध्यम से
उन्हें बाहर निकाल पाता,
तो मेरे लिए लिखने की
आवश्यकता ही न होती|
पर मेरे इर्द-गिर्द लोगों का वास्ता
मेरी दुखानुभूतियों से नहीं,
मेरी सुखानुभूतियों से हैं;
और इन्द्रियों के मध्यम से
अपनी दुखानुभूतियों को बाहर निकालने की
बी मुझमे क्षमता नहीं —-
मैं काफ़ी सयाना हो गया हूँ|
            मेरी लेखनी द्वारा
            पीड़ा और कचोट के,
            ईर्ष्या और क्रोध के,
            क्षोभ और स्पर्धा के
            अनायास जो भावचित्र खिंच गए हैं,
            उन्हें तुम कविता की संज्ञा देते हो;
            और तुम्हारा आग्रह है कि मैं भी
            कवि सम्मेलनों में भाग लूँ|
तुम भूलते हो —-
कवि सम्मलेन कवियों के लिए
आयोजित नहीं होता|
उसका आयोजन विशेष अवसर पर
किया जाता है;
और उसमें श्रोता के रूप में
गिने-चुने कवियों के अलावा
अन्य लोग ही अधिक होते हैं|
            तुम्हारी बात अलग है|
            तुम सपरिश्रम कविता लिखते हो,
            तुम्हारा यही व्यवसाय है|
            अनुभूति और चिंतन के पचड़े में न पड़
            इसी कारण अपने उक्ति-वैचित्र्य से,
            तुम लोगों का मनोरंजन करना जानते हो;
            और लोग तुम्हें महाकवि कि उपाधि से भी
            विभूषित कर चुके हैं|

It is the poet’s birthday today.

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