अग्नि-अभिसार

दिसम्बर 7, 2008 at 8:39 अपराह्न (Poetry) ()

– Ghanshyam

रोष, क्रोध दो, इर्ष्या दो, अग्नि-अभिसार |
बधिर कर दो, संज्ञाशून्य;
चूर्ण-विचूर्ण भस्मित हो जाऊं मैं |

आशीष अभिषिक्त तब, बरसे लोचन,
सुरभि, संगीत, रसलिंगन,
जीवन हो आलोकित, सक्षम |

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परमालिंक 1 टिप्पणी

दो पंक्तियाँ

दिसम्बर 7, 2008 at 8:31 अपराह्न (Couplet)

– Ghanshyam

पढने को पढ़ा है सबक सादगी का
जीने को कुछ और ही सीखा है |

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