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नवम्बर 30, 2008 at 12:32 पूर्वाह्न (Poetry)

– Ghanshyam

तुम्हें यदि घाव देखने हो मेरे,
बढ़ा दो शून्य में तुम हाथ अपना;
जलन का दाग मूर्च्छित हैं वहीँ पर,
दहकता है वहीँ निभृत निर्धूम सपना.

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दो पंक्तियाँ

नवम्बर 30, 2008 at 12:18 पूर्वाह्न (Couplet, Uncategorized)

– Ghanshyam

इतने सपने संजो के रखें हैं दिल ने मेरे,
डूबी रहती हैं नींद में सदा आँखें मेरी.

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