दो पंक्तियाँ (A couplet)

मई 7, 2014 at 11:08 अपराह्न (Uncategorized)

—– Ghanshyam

Ghanshyamअपनी शख़्सियत का उन्हें होश नहीं
ग़ैर की वाह-वाही किये जाते हैं ।

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क्षमा-याचना

जनवरी 28, 2012 at 11:37 अपराह्न (Poetry)

— Ghanshyam

(Written for his year old daughter in 1981)

अल्पकालीन प्रवास में भी
तुम्हारा ध्यान
मुझे कातर करता रहा,
और लौटती बार लम्बे सफ़र में
नींद की जगह
तुम ही झूलती रही
मेरी आँखों में रात भर |
अभी जब मैं अहले सुबह
प्रवास से लौटा हूँ,
और अहाते का फाटक खोल
दरवाज़े पर पहुँच
तुम्हे पुकारने वाला ही हूँ
कि ठीक प्रवेशद्वार पर ही
अहाते के भीतर खड़े
अरहर के पौधे की डालियाँ
एक बार हवा में लहरा
मेरे माथे पर झुक पड़ी हैं,
और एक मसृण गुदगुदाहट ने
मुझे वात्सल्य-विभोर कर दिया है,
अकथ – अनाम निस्पृहता की एक बयार से
मेरी आँखें नाम हो उठी हैं ;
अपनी प्राणप्रिया नन्ही बिटिया को भूल
मैं डालियों को गले लगा
क्षमा-याचना के भाव से
भर उठा हूँ |

(It is the poet’s birthday today.)

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दो पंक्तियाँ

जनवरी 30, 2011 at 12:39 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

अब न फिसलने का डर है, न चकाचौंध होने का,
मैंने सीख लिया है सबक, नीची नज़र रखने का |

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सांत्वना मरियल सी

जनवरी 29, 2011 at 12:01 पूर्वाह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

क्यों बार-बार आती है मेरी आँखों के सामने
पोर-पोर सूखी और बदरंगी पेड़ों की गलियाँ?
क्या हुआ है मेरी याददाश्त को की मैं भूल गया हूँ
हरियालियों के सारे खूबसूरत नज़ारे?
क्यों बुझा-बुझा सा मैं दीखता हूँ दोस्तों के बीच,
क्यों अचानक लंगड़ा गया मेरा सबल व्यक्तित्व?
क्यों कोई धकेलता है मुझे पीछे से रास्ते पर,
इस तरह रास्ते क्यों लम्बे होते जाते हैं?
एक मरियल सी सांत्वना शेष है — भीड़ में मैं अकेला नहीं हूँ |

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दो पंक्तियाँ

जनवरी 28, 2011 at 10:38 अपराह्न (Couplet)

— Ghanshyam

चाँद छूने के बाद तुम्हें छूना है सूरज भी,
मेरे ख़्वाबों का मीनार मगर आसमां से भी ऊंचा है |

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पड़ाव (Padaav)

अप्रैल 20, 2010 at 11:59 अपराह्न (Poetry) (, , , , , )

— Ghanshyam

कल वाले सांचे में ढला
प्रतीत होता नहीं
आज का भोर;
सूरत और सीरत – कोई भी
लगती नहीं बासी |
तब भी,
कल वाला भोर नया था,
आज वाला भी नया है |
कल के भोर
उपजा था नया रंग,
नया संगीत;
कल भी भोर
महका था नया-नया |
आजसे कम उल्लासित नहीं था
कल का भोर,
होने को जैसे कम उल्लासित नहीं
शायद आज के बाद भोर |
कल वाले भोर ने
जैसे शुरू की यात्रा
नए पड़ाव से,
आज का भी भोर
चलने को उद्दत है
एक नए पड़ाव से |

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कला जीने की (Kala Jeene Ki)

मार्च 26, 2010 at 12:02 पूर्वाह्न (Poetry) (, , , , , )

– Ghanshyam

जीना रहता यदि
हवा और पानी को,
सूरज की किरणों को अथवा
चन्द्रमा की ज्योत्सना को —
सरपट दौड़ता मैं
बेलगाम रह पर |
किन्तु,
मुझे जीना है तुम्हे,
तुम्हारी अपेक्षाओं को, तुम्हारी शिकायतों को
लेने नहीं देती जो कभी दम मुझे |
जीने की कला में इसी कारण
निष्पात होने को,
चाबुक पर चाबुक
दिए जाता हूँ मैं
अपनी पीठ पर |

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डरा हुआ आदमी (Dara Hua Aadmi)

मार्च 24, 2010 at 11:47 अपराह्न (Poetry) (, , , , , )

– Ghanshyam

तुम चलते-चलते भी नहीं थकते,
मैं लेटे-लेटे ही थक जाता हूँ |
पुरानी सुखद स्मृतियों के पन्ने
आखिर सीमित हैं
जिनकी आवृत्ति मैं
लेटे-लेटे किया करता हूँ |
अंधकार में पड़ी-पड़ी
यह स्मृतियाँ
जिनसे मैं ज़िन्दगी की अपेक्षा रखता हूँ
अब सीलन से भर गयी हैं |
तुम्हारे स्वस्थ, अवदात मुखारविंद से
जो ज्योति झरती है
वह रोज़ नई हवा, नई रौशनी से
झूमने का परिणाम है |
पर मैं डरा हुआ आदमी हूँ |
सुखद स्मृतियों की अपनी छोटी जीर्ण शीर्ण पुस्तक
नये दिन, नये सूरज और नई संझा को
भेंट नहीं कर सकता |

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शुचिता

जुलाई 24, 2009 at 11:41 अपराह्न (Poetry) ()

— Ghanshyam

सांसों की परिधि के बहार,

लय के नि:शेष होने पर,

मौन धड़कन भी अदृश्यरेफ है जहां,

चित्र-शुचिता जिससे भंग होती है,

उस अतल में ले चलो मां मुझे,

जननी गंगा के उदगम बिंदु में, सिन्धु में

                                              डुबो दो मुझे!

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दो पंक्तियाँ

जुलाई 22, 2009 at 5:12 अपराह्न (Uncategorized)

— Ghanshyam

अदावत को अब भी तो अलविदा दो दोस्त
रस्म-अदायगी के आंसुओं से क्यों भिगोते हो कफ़न मेरा?

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